Mumbai Trans Harbour Link की पूरी कहानी | Mumbai Trans Harbour Link Ki Puri Kahani

दोस्तों सपनों के शहर और देश के इकोनॉमिक कैपिटल मुंबई की हिस्टरी यूं तो बहुत लंबी है, लेकिन पिछले कुछ सालों से इस शहर भीड़ भाड़ ट्रैफिक जाम और अपने खराब ट्रान्सपोर्टेशन के लिए काफी मशहूर हो चुका है। मुंबई को दुनिया की पांचवीं सबसे बिज़ी शहरों में गिना जाता है।

मुंबई के ट्रैफिक और खराब ट्रांसपोर्टेशन की वजह से यहाँ की जियोग्राफी अगर आप मुंबई के मैप को देखेंगे तो आपको समझ में आएगा कि बाकी शहरों के कंपैरिजन में मुंबई की जियोग्राफी थोड़ी अलग है। जैसे अगर हम दिल्ली और मुंबई का ही एग्ज़ैम्पल ले तो हम पाएंगे कि दिल्ली 52किलोमीटर लंबा और 48किलोमीटर चौड़ा शहर है।

जिसकी वजह से हम कह सकते हैं कि दिल्ली को कुछ हद तक सिस्टमैटिक्ली हर तरफ से बराबर ही है, लेकिन मुंबई के साथ है ऐसा नहीं है। ये शहर के अरेबियन सी के किनारे नॉर्थ से लेकर साउथ तक लंबाई में फैला हुआ है और इसकी चौड़ाई बहुत कम है। इसी वजह से मुंबई में ट्रैफिक की समस्या बनी रहती है। लेकिन अब मुंबई को इस ट्रैफिक समस्या से छुटकारा मिल गया है ।

तो आखिर क्या है मुंबई का Mumbai Trans Harbour Link Project 21.8 किलोमीटर लंबा समुद्री पुल है, जो मुंबई को नवी मुंबई से जोड़ेगा। इस प्रोजेक्ट का 16.5 किलोमीटर का पार्ट समुद्र पे से गुजरता है। वहीं 5.3 किलोमीटर का हिस्सा लैन्ड से होकर गुजरता है। ये पुल मुंबई में से नवी मुंबई में तक की जर्नी का समय 2घंटे से घटाकर सिर्फ 20मिनट कर देगा। इस ब्रिज के बनने के बाद मुंबई और नवी मुंबई के साथ ही रायगढ़ और गोवा का रास्ता भी आसान हो जाएगा। इस प्रोजेक्ट का काम 2018 में 17,843 करोड़ की लागत से शुरू हुआ था।

Mumbai Trans Harbour Link

इसे बनाने में भारत में पहली बार कॉन्क्रीट और स्टील के साथ ऑर्थोटोपिक स्टील डेक टेक्नीक का इस्तेमाल किया गया है ताकि समुद्र से गुज़रने वाले बड़े जहाजों को आसानी से रास्ता मिल सके। समुद्र पर बन रहे इस पुल को जोड़ने के लिए कुल 70 ओर्थोटोपिक स्टील डैड को लॉन्च किया गया था। जी हाँ, जिसकी लंबाई 90 मीटर से 180 मीटर है,

इस OSD को लाने और लगाने के लिए फुटबॉल ग्राउंड के साइज का एक स्पेशल बार्ज यानी की एक तरीके की बोट को बनाया गया था। इस प्रोजेक्ट में हुआ है। इस प्रोजेक्ट में OSD सुपर स्ट्रक्चर के लिए 85,000 टन स्टील का उपयोग किया गया है, जिसकी लागत करीब ₹4300 करोड़ होगी। देश में पहली बार बेहतरीन इंजीनियरिंग के जरिए OSD तकनीक का इस्तेमाल किया गया दोस्तों जो कि स्टील डेक सुपर स्ट्रक्चर है और कॉन्क्रीट सुपर स्ट्रक्चर के कम्पेरिज़न में अधिक वेट पुल उठा सकता है।

Mumbai Trans Harbour Link

OSD तकनीक के स्टील का प्रोडक्शन जापान, कोरिया, वियतनाम, ताइवान और म्यांमार में होता है। वहीं जीनियस का कहना है कि ट्रांस हार्बर लिंक पर गाड़ी चलाते समय ड्राइवर्स को दूर तक फैले समुद्र का नजारा भी देखने को मिलेगा। इसलिए इसमें 1550 मिलीमीटर हाइट का व्हीकल क्रैश बैरियर भी लगाए गए हैं। बताया जा रहा है की ये कॉन्क्रीट और मेटल का कॉम्बिनेशन है,

जिसके ऊपर 900 एमएम हाइ कॉन्क्रीट, 1000 व्हीकल के रोजाना यहाँ से गुज़रने का अनुमान है। इस प्रोजेक्ट के मेन पर्पस ट्रैफिक को कम करना है और इकोनॉमिक ग्रोथ को बढ़ाना है। समुद्र में 16.5 किलोमीटर लंबे इस पुल को तैयार करने के लिए मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीज़न डेवलपमेंट अथॉरिटी यानी की MMRDA 500 से अधिक पिलर बनाने पड़े हैं।

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इसके अलावा समुद्र में तैयार करने के समय भी काफी सावधानी बरती गई है। समुद्र में कई जगहों पर तेल कंपनियों ने पाइपलाइन बिछाई है, जिसके चलते खुदाई का काम शुरू करने से पहले गोताखोरों की मदद ली गई थी। गोताखोरों को पानी के भीतर करीब 13 मीटर तक नीचे भेजा गया। ये समुद्री पुल ओपन रोड ट्रोलिंग यानी की ORT सिस्टम से लैस पहला पुल होगा। पुल पर भी मैक्सिमम स्पीड लिमिट 100 किलोमीटर प्रति घंटे तक की होगी और इससे मुंबई ट्रैफिक कंट्रोल सेंटर द्वारा सीसीटीवी कैमरे के जरिए मैनेज किया जाएगा।

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आपको बता दें दोस्तों की प्रोजेक्ट के अनुसार मुंबई में शिवड़ी है, और शिवाजीनगर और नवी मुंबई के चरली में थ्री लेवल इन्टर्चेन्ज होंगे, जो शिवडी वर्ली कनेक्टर और ईस्टर्न एक्सप्रेस वे को जोड़ेंगे। इस प्रोजेक्ट में जापान इंटरनेशनल कॉरपोरेशन एजेंसी भी फंड कर रही है।

Mumbai Trans Harbour Link

दोस्तों, इस प्रोजेक्ट पर काम भले ही 2018 से शुरू हुआ हो, लेकिन इस प्रोजेक्ट को लेकर सबसे पहले 1967 में ही आइडिया आ गया था। उस समय की सरकार ने मुंबई के कोलाबा से नवी मुंबई के उरान तक ब्रिज बनाने का प्रपोजल रखा था, लेकिन उस समय नेवी और पोर्ट अथॉरिटीज़ ने इसका विरोध भी किया था। 1981 में जेआरडी टाटा की अगुवाई वाले ग्रुप ने भी सेवरी नावां रोड बनाने की मांग की थी।

1984 में इसको लेकर पीएमओ द्वारा फाइनल अलाइनमेंट की मंजूरी दी गई, लेकिन मामला 2004 तक पूरी तरह लटका रहा। इस पुल को बनाने के लिए ठोस प्रयास 2004 में भी किये गए। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशल सर्विसेज की यानी की आईएल ऐंड एफएस ने बिल्डकॉन ऑपरेटर ट्रांसफर यानी की बूट के बेस पर इस प्रोजेक्ट को लागू करने का प्रपोजल रखा था।

हाला की उस समय भी बिना किसी कारण बताए इस प्रोजेक्ट को इग्नोर कर दिया गया। 2005 में महाराष्ट्र स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के प्रपोज़ल पर बेट जारी की गई, जिसमें कई कंपनियों ने पार्टिसिपेट भी किया। लेकिन इस बार भी मामला कोर्ट कचहरी के चक्कर में रहकर ही फंस गया। फाइनली 2013 में यह प्रोजेक्ट मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीज़न डेवलपमेंट अथॉरिटी को मिला।

  • 10 साल में इसकी कोस्ट 3 गुना से ज्यादा हो गईं।
  • 2005 में इस प्रोजेक्ट की लागत ₹4500 करोड़ तक की गई थी, जो 2018 में बढ़कर ₹17,843 करोड़ हो गई, जिसका लगभग 85% हिस्सा जापान इंटरनेशनल ऑपरेशन एजेंसी यानी JICA लोन के द्वारा फंड कर रही है

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